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बहिखाता 1

बहिखाता

कुछ फ़ुर्सत के पलों में आज,
यादों के पन्नो को पलट रहा था |
क्या मिला और क्या छूटा अब तक,
शायद हिसाब लगा रहा था |

शुरुआती पन्ने कुछ गल से गये थे,
लिखा साफ दिख रहा नही था |
धुंधले से कई शब्द दिखे थे,
बचपन समेटे कुछ लिखा हुआ था |

शांत, सहज, पन्ने पलट रहा था,
चित्रपट  पर जैसे,
बीता वक़्त मैं देख रहा था |
कभी मंद मुस्काता , तो कभी
आँखों में पानी आता,
काश समय वो लौट के आता,
शायद मैं ये सोच रहा था |

हिसाब बराबर लगा रहा था,
खोने से ज़्यादा, पाया ही था |
पर जो खोया,
उस पर अफ़सोस जताना, वाजिब नही था |
बचपन था वो, जो अब जी लिया,
वो किरदार, कब का निभा लिया |

तभी खुद को मैने, भावुक पाया,
बिसरी यादों से बाहर आया |
सोचा, हर चीज़ का हिसाब नही होता,
संजोए हुए पुरानी यादों का,
कोई बहिखाता नही होता |

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  1. Tanweer Noor
    January 29, 2010 at 5:44 pm

    good one dost!!!

  2. Nayan
    January 29, 2010 at 8:41 pm

    dost chaa gaye…thodi aur details mein likha hota ki kya khoya kya paya tto aur mazaa aata…waiting for बहिखाता sequel

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