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Archive for the ‘Hindi Poems’ Category

६२वा गणतंत्र

January 26, 2011 2 comments

६२वा गणतंत्र दिवस लो आ गया,
इकसठ से बासठ की यात्रा का रोमांच,
आखों के पर्दे पर फ्लैश बैक सा चल गया |

जो यात्रा, प्याज के २० रुपये प्रति किलो से शुरू हुई,
वो ६५ रुपये के नए आयाम को छू गई,
तरक्की और स्पीड तो देखो,
जापान की बुलेट ट्रेन को भी पीछे छोड़ गई |

कुछ और विश्लेषण करें,
इकसठ से बासठ तक के सफ़र का अगर,
लास वेगास और मियामी से भी ज़्यादा,
हॅपनिंग अपना देश रहा |

अमरीका में मार्क ज़ुक्केरबेर्ग बिलियनेर बना,
तो हमारे यहाँ,
टू जी की स्पीड से ए राजा,
उसका भी बाप बना |

कॉमन वेल्थ गेम्स करा,
कलमाडी ने क्या खूब झंडा गाड़ा,
बार्गैनिन्ग का अर्थ बदला,
चार-चार आने के उपकर्नो को,
लाखों-लाख में खरीदा |

गणतंत्र हमारा,
अभी कम बुलंद हुआ था,
कि अशोक चावान ने स्वर्णिम अध्याय जोड़ा
जब आपका-हमारा हिस्सा कम पड़ा,
शहीदों का “आदर्श” भी खाया और पचाया |

नही है मंशा “अनुपम” की,
सिर्फ़, कमियाँ आज गिनाने की,
निवेदन कहो, या पुकार है
बिखरते गणतंत्र को संगठित करने की |

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Aashaa

July 26, 2010 5 comments

आशा

किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ मैं, झाँक रहा था खिड़की से |

कि ढलते सूरज की क़िरणें, आ टकराई पलकों से |

अंबर पर छाती काली निशा, खाती किरणों को तेजी से |

बढ़ती नभ में कालीमा, हो जैसे व्याकुल कहने को |

हर रैन ले आती है संग अपने, आशा इक उजले सवेरे की ||

ले सबक मैं प्रकृति से, पट खिड़की का बंद किया |

छत को देख अंधेरे कमरे में, फिर गहरी सी साँस लिया |

कुछ पल विचरण करने को, जा पहुँचा अतीत के आँगन में |

पाया समय ना कभी समान रहा, परसों कल और आज में |

तो क्यों ना करे कल उषा की आशा, जब वर्तमान मिला हो निष्प्रभ में ||

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Sachin Chalisa

July 12, 2010 11 comments

जै सचिन कौशल गुण सागर, जै तेंदुलकर तिहु लोक उजागर |
क्रिकेट दूत अतुलित बाल धामा, रजनी पुत्र रमेश सूत नामा ||

महावीर तुम क्रिकेट के बजरंगी, पराजय निवार विजय के सन्गी |
गेहुवा वरण विराज सुबेसा, मुख पर मुसकान घुंघराले केशा ||

हाथ बैट और तिरंगा विराजे, काँधे राष्ट्र का गौरव साजे |
ब्रैडमैन सूवन रमेश के नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन ||

तेजवान गुनि अति चातुर, राष्ट्र हित प्रदर्शन करने को आतुर |
शत्रु विध्वंस करिबे को रसिया, तुम जन-जन के हो मान बसिया ||

गेंदबाज रूप धरी हीरो कप जितायो, बल्लेबाज रूप में धूल चटायो |
हरफ़नमौला बन अस्ट्रेलिया संहारे, भारतवर्ष के स्वप्न संवारे ||

संपूर्ण विश्व तुम्हारो यश गावे, है इच्छा तुम्हे कंठ लगावे |
गावस्कर लाय्ड सोबर्स जैसा, है तू ब्रॅड्मन रिचर्ड्स हेमंड जैसा ||

तुम्हारो मन्त्र सब जग माने, विश्वेश्वर भए हम सब जाने |
सत्रह हज़ार रन ऐसे बनाए, जैसे कोई मधुर फल खाए ||

सब जन आशा हृदय रख माही, बीस वर्ष लाँघ गये अचरज नाही |
दुर्गम रेकार्ड जगत के जेते, सुगम अनुग्रह टुम्हारे तेते ||

आपन बल्ला समहारो आपे, ये भूलोक हांक से कापे |
कोई प्रतिद्वंदी निकट नही आवे, सचिन तेंदुलकर जब नाम सुनावे ||

चारो जुग प्रताप तुम्हारा, सचिन नाम से हो ये जग उजियारा |
विपदा में टीम के तुम रखवारे, विरोधी निकंदन हम सब के दुलारे ||

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एक दिवस फिर बीत गया !

June 4, 2010 5 comments

एक दिवस फिर बीत गया !

आज पुनः फिर एक दिवस, आशा-हताशा संग बीत गया,
सौदामिनी संग दिन शुरू किया, कालिमा संग ये प्रश्‍न रह गया,
किस उद्देश्य को पूर्ण किया, और ना जाने क्या छूट गया,
आज पुनः फिर एक दिवस, आशा-हताशा संग बीत गया |

तरल तरंगो में बहता, भीषण थपेड़ों को सहता,
ढृढ खड़ा क्रुद्ध सिंधु में, कब तक सहता उनका प्रतिघात,
तरंग-शिलाओं से टकरा, कण-कण जर-जर बिखर गया,
आज पुनः फिर एक दिवस, आशा-हताशा संग बीत गया |

अनस्तित्व निरंतर करता, प्रयास प्राण के भेदन का,
रुद्र बन मैं तांडव करता, कभी तो विराम लगाने का,
या कभी बन तरुण तपस्वी, साधन कर सांकल लगाया,
आज पुनः फिर एक दिवस, आशा-हताशा संग बीत गया |

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Meri Madhushala -2

May 21, 2010 5 comments
“Meri Madhushala-2” is my second effort (first being this) to write a poem using the instruments of Bachchan ji [madira or haala (wine), saaki (server), pyaala (cup or glass) and madhusala, madiralaya (pub/bar) ] that he used in Madhushala to explain the complexities of life. I hope I have not hurt the emotions of his fans and expect your inputs on how to improve for next versions. I am highly inspired by Madhushala and I maintain that nothing can match it’s stature ever.

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नियमित चला था राह पे अपनी, कि खनका कहीं तो था प्याला,
कदम मुड़े और बढ़ चले, हो जैसे पुकारे साकीबाला,
चलते चलते जीर्ण हुआ अब, जीवन की त्वरित गति में मैं,
मधुमय कर, लौटा दो बल, अब तो मेरा ओ मधुशाला |
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इधर नही, और उधर नही, मिले जहाँ मुझको हाला,
रम जाऊँगा, धुनि लगा के, हाथ में लिए अपना प्याला,
न व्यर्थ करूँगा जीवन शेष, दुनिया की आपा-धापी में,
जब आ पहुँचू चौखट पर तेरे, नहलाना मधु से मधुशाला |
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मानव जनम

March 8, 2010 3 comments

कभी सोचा है
पृथ्वी पर हैं कितने जीव,
जो हैं सजीव,
और लेते हैं श्वास |
अरबों सहस्त्र भी कदाचित्,
संख्या पड़ेगी कम,
और कभी सोचा है,
की उनमे भी,
कितने मनुश्य हैं हम |
फिर भी रहते हैं,
पग पग पर
जीवन से निराश हम |
क्षणिक हताशा,
से हो पराजित,
उठा लेते हैं
हम अंतिम कदम,
है नही अनुमान,
कि कितना विशेषाधिकृत ,
है ये मानव जनम |

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मेरी मधुशाला

February 17, 2010 4 comments

I am an ardent admirer of Shri. Harivansh Rai Bachchan and read his many poems including epics like Madhushala and Madhubala. I am highly inspired by Madhushala and believe nothing can match it’s stature ever. 

“Meri Madhushala” is a humble effort to use the instruments of Bachchan ji [madira or haala (wine), saaki (server), pyaala (cup or glass) and madhusala, madiralaya (pub/bar) ] that he used in Madhushala to explain the complexities of life. I hope I have not hurt the emotions of his fans and expect your inputs on how to improve for next versions.

 

निराकार की करते तलाश,
आ पहुँचा मैं मधुशाला को,
निःसत्व हुआ मन का प्याला,
भर दो सिरे तक साकी हाला |

आज पीऊँगा जी भर मैं,
जब तक खुली रहे ये मधुशाला |
जो सूख गई हैं धमनी मेरी,
बहने दो नसों में अब हाला |

मदिरा मदिरा कहते सब,
है विष घातक जीवन को |
मैं कहता छूने दो अधर को,
सुधा बन, कंठ में बरसे ये हाला |

आज ना रुकना साकी तुम,
ना खाली हो मेरा प्याला |
है आशा कि, अभौतिक से
मेल कराती ये मधुशाला |

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